जब भी सोचता हूं,
दर्द के बारे में,
तो मां की याद आती है,
उसका चेहरा सामने आता है,
यूं तो इस पितृसत्तात्मक समाज में,
स्त्रि होना ही अपने आप में,
न जाने कितने दर्दों के,
के बराबर का दर्द है,
और उसके बाद,
प्रसव का दर्द,
कैंसर का दर्द,
कैंसर के इलाज का दर्द,दर्द को ना समझा पाने का दर्द,दर्द के इलाज न होने का दर्द,हर ऊटपटांग सलाह का दर्द,किसी की ये दार्शनिकता का दर्द,की दर्द तो जीवन की आवश्यकता है...